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Tumbbad movie review: A visually Scary story of greed, gold and Mystery

विजुअल इफेक्ट्स और पंकज कुमार की सिनमैटोग्राफी से दहशत

English:

The best form of horror is one which plays with your mind. The fear of the uncertain and the unknown is what evokes the strongest emotions. Tumbbad is a perfect example of a film that creates a surreal illusion. This psychological horror has its traditional moments of blood and gore, but the most promising part of this terrifying fable is that it makes monsters out of ordinary men. A greedy human can be a lot more malicious than a cursed supernatural entity. Ideas like that make Tumbbad a real mind-bender and the film’s top-notch production design makes it a movie that truly reinvents the horror genre for Indian cinema.

The rain never stops in the town of Tumbbad. It is an accursed land because it holds a temple to an accursed god — a god so wretched that his name must not be spoken — and yet this god holds gold, which is why the temple exists, and why this curse is wilfully borne by the greedy as they brave the un-drought and seek damned riches.

Set from 1913 to 1947, the period detailing is authentic as well as fanciful. There are boys with tikis, a grotesque old woman who looks like an outtake from Mad Max: Fury Road, and a ponytailed moneylender who has a sign on his door that requests the visitor to ring the bell only once because the inhabitants are not deaf. The protagonist Vinayak, played by an impressive Sohum Shah, smiles at this and promptly rings it twice.

Hindi:

फिल्म की शुरुआत 1918 में महाराष्ट्र के एक गांव तुंबाड से होती है। मूसलाधार बारिश से सराबोर रहने वाले इस गांव की एक जर्जर हवेली में एक विधवा (ज्योति मालशे) एक वृद्ध की सेवा में लगी रहती है। गांव में प्रचलित कहानी के अनुसार, यह जर्जर हवेली देवी का सोना ले उड़ने वाले लालची पुत्र हस्तर का मंदिर है, जिसमें खजाना छिपा हुआ है। वीराने में स्थित अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी में दो छोटे बच्चों के साथ गुजर-बसर करने वाली यह विधवा इसी सोने की चाह में न केवल बूढ़े की सेवा करती है, बल्कि जान हथेली पर रखकर जंजीरों में जकड़ी उसकी दैत्य पत्नी के खाने का इंतजाम भी करती है।

बावजूद इसके उसके हाथ सोने के एक सिक्के के अलावा कुछ नहीं लगता, उल्टे अपने छोटे बेटे को भी गंवाना पड़ता है। इसीलिए, वह अपने बड़े बेटे विनायक के साथ हमेशा के लिए तुंबाड गांव छोड़कर पुणे आ जाती है और उससे वादा लेती है कि वह तुंबाड कभी नहीं लौटेगा। विनायक मां से वादा तो कर लेता है, लेकिन अपने पुरखों के खजाने को नहीं भूल पाता और बड़ा होकर उसकी तलाश में लौटकर तुंबाड ही पहुंचता है। अब सोने के इन सिक्कों को बटोरने की लालच में वह किस हद तक पहुंचता है, यह देखकर दर्शक सिहर उठते हैं।

बढ़िया विजुअल इफेक्ट्स और पंकज कुमार की सिनमैटोग्राफी से दहशत का माहौल शुरू से ही बनने लगता है। कई सीन डर के मारे आंखें भींचने पर मजबूर कर देते हैं। सेकंड हाफ में कुछ सीन रेपटेटिव लगते हैं, जिससे कभी-कभी इंट्रेस्ट कम होने लगता है, लेकिन क्लाइमैक्स रोंगटे खड़ा कर देता है। फिल्म ‘सिमरन’ में अपनी नैचरल ऐक्टिंग के लिए तारीफ बटोरने वाले सोहम शाह विनायक के रोल में एक पायदान और ऊपर चढ़े हैं। उनकी मां के रोल में ज्योति मालशे और उनके बेटे के किरदार में बाल कलाकार मोहम्मद समद ने भी बढ़िया काम किया है। अजय-अतुल और जेस्पर कीड का संगीत फिल्म के अनुरूप है।

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