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Thugs Of Hindostan review: 1 star

ये फिल्म पैसे की बर्बादी है इस फिल्म से दूर ही रहिए तो अच्छा है

Aamir Khan and Amitabh Bachchan’s film is Pirates Of The Caribbean without pirates or Caribbean. It is a film so dull and unoriginal that it can only inspire the shrugs of Hindustan. Full of slow-motions sequences, director Vijay Krishna Acharya amps up the frames per second to disguise the lack of storytelling craft. Aamir’s character in the film is one of his most unremarkable characters, a rogue free of charisma or cleverness, with barely a line worth remembering.

In this 1810-set adventure, Aamir borrows the Jack Sparrow eyeliner, while Amitabh is literally given the bird, his entrances on screen preceded by a noisy hawk. Bachchan plays a rebel, a freedom fighter rallying troops against the colonisers, while Khan is a two-faced rogue on the Company payroll sent to infiltrate Bachchan’s squad and bring him down.

The girls have it worse. Fatima Sana Shaikh, who was so good in Dangal, plays a princess who doesn’t have a line for the first hour, but is a fierce combatant – just, mind you, not fierce enough. She’s a warrior who repeatedly needs to be rescued, but hey, at least she makes excellent sandcastles. Shaikh doesn’t bring much to the part, and when she does speak, she does it flatly enough to justify her lack of lines. Also, there is an upside-down stick figure tattooed on her chin, like someone played Hangman on her face while she was sleeping.

An old man sings about imli, Sharat Saxena tries to look valiant, Ila Arun plays a medicine woman, while Mohammad Zeeshan Ayub, who plays Khan’s man Friday, is literally named Saturday. And then – by the beloved beard of Bob Christo – there are the redcoats, hamming it up. The British villain is given the naturally despised name Clive, and speaks to his fellow Englishman in Hindi, even when the two are alone and he’s saying he’ll never understand Indians.

I may be old school, but I believe pirate movies need to have eye-patches. This one doesn’t, and that’s a shame.

 

HINDI

फिल्म ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान सन 1795 के उस दौर की कहानी बताती है, जब हिंदुस्तान की तमाम रियासतों पर अंग्रेजों का राज हो चुका है और बची-खुची रियासतों पर भी उनकी नजर थी। ऐसी ही एक रियासत रौनकपुर को अंग्रेज कमांडर जॉन क्लाइव (लॉयड ओवेन) धोखे से कब्जा लेता है। वहां के नवाब मिर्जा सिकंदर बेग (रोनित रॉय) के परिवार को अंग्रेज मार देते हैं, लेकिन उसकी बेटी जफीरा (फातिमा सना शेख) को राज्य का वफादार खुदाबख्श आजाद (अमिताभ बच्चन) बचा कर ले जाता है। करीब एक दशक तक आजाद छुपकर अपने लोगों को इकट्ठा करता है और फिर अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ देता है। इस जंग में जफीरा भी अपने परिवार का बदला लेने के लिए उसके साथ है।

आजाद की बढ़ती ताकत से परेशान अंग्रेज उसे उसी के अंदाज में मात देने के लिए किसी शातिर आदमी को तलाशते हैं। उनकी तलाश फिरंगी मल्लाह (आमिर खान) पर पूरी होती है। फिरंगी अवध का रहने वाला एक छोटा-मोटा ठग है, जो किसी भी तरह पैसा कमाने की जुगत में रहता है। वह अंग्रेजों के लिए ठगों को पकड़वाने का काम करता है। वहीं सुरैया (कैटरीना कैफ) एक नाचने वाली है। फिरंगी उसका आशिक है। अंग्रेजों की योजना के मुताबिक फिरंगी ठगों की सेना में अंग्रेजों का मुखबिर बनकर शामिल हो जाता है। क्या फिरंगी अंग्रेजों के प्लान को पूरा कर पाता है? या फिर वह भी उन्हें भी ठग लेता है? इसका जवाब आपको सिनेमाघर में जाकर ही मिल पाएगा।

इस फिल्म की सबसे बड़ी परेशानी यही है कि फिल्म में ऐसा एक भी सीन नहीं है जिसके अंदर खूबी हो आपको अपने सीट से चिपकाने की. लगभग पौने तीन घंटे की ये फिल्म आपको बोर ज्यादा करती है. आपको इस बात की जानकारी पहले हो जाती है कि आगे क्या होने वाला है. इस फिल्म के बारे में ऐसा कहा जा सकता है कि जिस तरह की बदले की भावना से ओत प्रोत फिल्में हम 80 के दशक में देखते थे, ठग्स ऑफ हिंदोस्तान कुछ वैसी ही है. अगर कुछ कमी रह गई है इस फिल्म में तो वो ये है कि फिल्म मेकर्स बदले जमाने के साथ इस फिल्म के रंग रूप को बदल नहीं पाए हैं.

आमिर खान और अमिताभ बच्चन को पहली बार फिल्मी पर्दे पर साथ लाने वाली फिल्म ठग्स ऑफ हिंदोस्तान के पहले अंग्रेज ऑफिसर फिलिप मिडोज टेलर की बेस्टसेलर नॉवल कंफेशंस ऑफ ए ठग पर आधारित होने की चर्चा थी। लेकिन अब यह फिल्म पूरी तरह कल्पना आधारित बताई जा रही है। हालांकि फिल्म का ट्रेलर देखने के बाद से ही फैंस ने इस फिल्म की तुलना पाइरेट्स ऑफ कैरेबियन की फिल्मों और आमिर खान की तुलना कैप्टन जैक स्पेरो यानी कि जॉन डीप से करनी शुरू कर दी थी। कुछ सीन्स में आमिर जैक का देसी वर्जन लगते भी हैं। कहीं-कहीं फिल्म भी देसी पाइरेट्स ऑफ कैरेबियन लगती है, तो लड़ाई के कुछ एक्शन सीन्स बाहुबली फिल्म की कॉपी लगते हैं।

ठग्स ऑफ हिंदोस्तान अगर एक बकवास फिल्म बनी है तो इसके पीछे कई लोग जिम्मेदार हैं. विजय कृष्णा आचार्य का निर्देशन बेहद औसत दर्जे का है. लगता है कि जब उनको इस बात का पता चल गया था कि फिल्म में अमिताभ बच्चन और आमिर खान एक साथ काम करने वाले हैं तब लगता है कि उसके बाद वो ख़ुशी के मारे अपना असली काम करना भूल गए. अजय-अतुल का संगीत बेहद ही साधारण है और ये यशराज फिल्म्स की परंपरा से मेल नहीं खाता. काश इस फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर देने वाले पर फिल्म के निर्माता ने अपनी चाबुक चलाई होती. इतना लाउड म्यूजिक फिल्म व्यूइंग एक्सपीरियंस को और कमजोर बनता है.

फिल्म की काफी शूटिंग जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में हुई है। इसके अलावा, जहाज वाले लड़ाई के सीन माल्टा में शूट किए गए हैं। मानुष नंदन की सिनेमटोग्रफी कमाल की है, जो कि आपको रोमांचित कर देती है। खासकर पानी के जहाजों पर लड़ाई के सीन काफी रोमांचक हैं। फिल्म के सेट काफी भव्य हैं। लेकिन 1795 के दौर को भव्य तरीके से दिखाने की चाहत में ही शायद इसका बजट 350 करोड़ के करीब पहुंच गया। वहीं कमजोर कहानी पर पौने तीन घंटे की फिल्म की लंबाई भी आपको काफी ज्यादा लगती है।

बड़े स्टार्स की मौजूदगी के बावजूद ठग्स ऑफ हिन्दोस्तान की कमजोर स्क्रिप्ट और कहानी आपको निराश करती है। अगर आप आमिर खान और अमिताभ बच्चन के जबरदस्त फैन हैं, तो इस फिल्म को महज टाइम पास के लिए देख सकते हैं।

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