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Jagat June, who is related to a small village of Haryana, Nuna Majra, is coming out with his new movie ‘Bewjah’

हरियाणा के एक छोटे से गांव नूना माजरा से ताल्लुक रखने वाले जगत जून अपनी नई फिल्म ‘बेवजह’ को लेकर आ रहे है.

ENGLISH

Generally quarantined and shy Jagat Joon, hails from a non-filmy background. He was born and raised in a village called Nuna Majra, Haryana (India). After graduating from a Hotel Management college in Kolkata, he worked in hospitality industry and BPO ,respectively, for quite sometime until 2013 when he decided to give his dreams a go. He made his first video with a phone camera in 2008. He, also authored a book named ‘Kolkata Rascals’

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HINDI

हरियाणा के एक छोटे से गांव नूना माजरा से ताल्लुक रखने वाले जगत जून अपनी नई फिल्म ‘बेवजह’ को लेकर चर्चा में हैं। कोलकाता से होटल मैनेजमेंट की डिग्री लेने के बाद साल 2013 तक जगत ने हॉस्पिटेलिटी इंडस्ट्री और बीपीओ में किस्मत आजमाई, लेकिन आखिरकार सपनों की तलाश उन्हें फिल्मों की तरफ ले गई। कॉरपोरेट फिल्में बना चुके जगत अपनी फिल्म को मिल रहे अच्छे रेसपॉन्स से खुश हैं। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने न सिर्फ इस फिल्म की कहानी खुद लिखी है, बल्कि इसका निर्देशन, कैमरा और एडिटिंग भी खुद ही की है।

हमने सोचा कि अपने सीमित संसाधनों में एक ऐसी फिल्म बनाई जाए, जिसे आठ साल का बच्चा भी देखे और 80 साल का बुजुर्ग भी, इससे लोगों को सीख भी मिले और उन्हें मजा भी आए। तो सबसे पहले हमने आठ साल के बच्चे से शुरुआत की। फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह एक औसत क्षमताओं वाला बच्चा प्रतिभाशाली बन जाता है और धीरे-धीरे उसका दिमाग आईंस्टीन की तरह तेज चलने लगा है। तब उसकी सोच साधारण बच्चों वाली नहीं रहती और इस बदलाव को हमने इतना स्वाभाविक रखा है कि यह बिल्कुल अटपटा नहीं लगता। बाद में वह बच्चा खुद संभावनाएं तलाशने लगता है कि और क्या नया हो सकता है।

इस फिल्म के मुख्य किरदार रोहन को खुद नहीं पता कि उसके साथ क्या हो रहा है और किस तरह उसकी जिंदगी में चीजें आगे बढ़ रही हैं, उसे अपने अतीत के बारे में धीरे-धीरे मालूम पड़ता है। इस फिल्म में ऐसी बहुत सी घटनाएं होती हैं, जिनका आपस में कोई संबंध नहीं है, लेकिन एक सिरे पर आकर वे आपस में जुड़ जाती हैं और यही स्थितियां आखिरकार फिल्म को क्लाइमेक्स तक पहुंचा देती हैं। इन सब चीजों को ध्यान में रखते हुए फिल्म का नाम ‘बेवजह’ रखा गया है। यह फिल्म एक ट्रायोलॉजी का हिस्सा है, जिसके बारे में हमने शुरुआती स्तर पर ही सोच लिया था। अगले हिस्से में हम इससे ज्यादा बड़ी चीजें दिखाई जाएंगी। मनोरंजन का स्तर भी अगली फिल्म में इससे बढ़कर होगा। इस फिल्म के कुछ किरदार अगली फिल्म में भी नजर आएंगे।

फिल्मों में जिस तरह का जादू दिखाया जाता है, हम उससे कुछ अलग हटके दिखाना चाहते थे। मसलन एक तेज रोशनी या धुएं के साथ गायब हो जाने जैसी चीज हम अपनी फिल्म में नहीं दिखाना चाहते थे क्योंकि इंसानी शरीर में ऐसे तत्व होते ही नहीं हैं। गायब होने की प्रक्रिया को हमने रियलिस्टिक रखने की कोशिश की है। हमने फिल्म में बच्चों पर ही फोकस रखने की सोची थी। इसके जरिए हम लोगों को दिमाग की ताकत का अहसास कराना चाहते थे। हम उन्हें दिखाना चाहते थे कि दिमाग हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन ड्रामा फिल्मों में जैसा नजर आता है कि एक को मारो, चार लोग गिर जाते हैं, वैसा हम अपनी फिल्म में नहीं दिखाना चाहते थे।

यह भी एक दिलचस्प कहानी है। हम सोच रहे थे कि या तो बहुत अच्छा चाइल्ड आर्टिस्ट ही मिल जाए या फिर जिसका चेहरा अपने आप में सबकुछ बयां कर दे। मुझे एक ऐसे बच्चे की तलाश थी, जो बच्चा भी न लगे और बहुत बड़ा भी न लगे ताकि अपने किरदार और शक्तियों के साथ वह स्वाभाविक लगे। इस किरदार के लिए सायंश मुझे मुफीद लगा, क्योंकि इसका चेहरा अपने आप में बहुत कुछ कहता है। बिना संवाद बोले भी इसके हावभाव प्रभावशाली दिखते हैं। वैसे सायंश मूल रूप से कलाकार भी नहीं है। मैंने उसे बताया कि उसे कैमरे का सामना किस तरह से करना है। इनकी हिंदी अच्छी नहीं है, लेकिन जब मैंने स्क्रीन पर देखा तो मुझे उसमें संभावनाएं नजर आईं और मैंने हां कर दी।

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